बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

सांझ ढले.....








सांझ ढले जब पंछी चहके , दहका सूरज भी कुम्हलाया  
विस्मृति की खिड़की से गुपचुप ,यादों का बादल घिर आया 

पाषाण हृदय के कारा में , हो तृषित जरा जो मन घबराया 
मूक अभागी तृष्णा पथराई , रेतीला दरिया बह आया 

स्वप्न शेष पर निंदिया रूठी ,कोरों में खारा जल आया  
न चेहरा दिखता न हीं सपन , दरपन दरपन भी धुन्धलाया  

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

अहले नज़र यूँ रब को बना लो



अहले नज़र यूँ रब को बना लो 
गमगीं दिल के ग़म अपना लो 

चश्म ए पुरनम छलकी जाए 
तश्ना लब थे प्यास बुझा लो 

जब अहसास भी सर्द लगें तो 
एक सुलगता ख्वाब जला लो 

दुनिया के रंजो गम बेज़ा 
हँसते गाते फुरसत पालो

ज़ुल्मो दहशत फैलाने वालों    
बेहतर इश्क का शिकवा गिला लो 

आँखों की बरसात थमे तो    
दीप 'दुआ' का एक  जला लो





अहले नज़र  = कद्रदान 
चश्म ऐ पुरनम  = आसुंओ से भरी हुई आँखें 
तश्ना लब = होठों की प्यास  

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

बीते रंग …









पता नहीं कितने बरसों से ... 
कोई नहीं जानता कब से ...
मेरा ह्रदय और ,
ह्रदय की अभिलाषाएं 
मेरी कालातीत संवेदनाएं 
मेरे मस्तिष्क की सोचो के 
भ्रमजाल में फंसी रहीं 
कोई नवीनता नहीं 
वही दिन ... वही रातें 
कभी गर्म ... कभी सर्द 
यादों का सिलसिला ....
पीछे छूटा हुआ पल-पल 
समय समय पर 
आज में जुड़ना चाहता रहा 
उनकी तस्वीर बनाता रहा 
पर , 
रंग पूरे नहीं हुए कभी 
कई रंग ... अतीत में खो गए 
कुछ फीके पड़ गए 
तस्वीर आज भी अधूरी है 
कभी यादों का सिलसिला 
इस मन को मजबूर कर देता है 
समय समय पर 
पीछे छुटे हुए पलों को 
आज में जोड़ कर 
उनकी तस्वीर बनाने के लिए 
पर ...
उस तस्वीर में भरने के लिए 
रंगों की कमी ... मुझे 
कभी बहुत पीछे धकेल देती है 
तो कभी रंगों की तलाश में 
मैं ... 
समय से आगे जाने की कोशिश कर बैठती हूँ 
पर ... पीछे छूटे  हुये कुछ पल 
बहुत गहरे में छुपे हुए हैं 
जो आगे तक दुबारा भी नहीं नज़र आते 
मैं ... उन्हें पाना चाहती हूँ 
अँधेरे से उजाले में लाना चाहती हूँ 
पर कैसे… ?
रहस्य की गर्त में छुपे पल 
बीते पल !
लौट कर नहीं आते 
और फिर बेशक कितने ही 
नए पल हासिल हो जाएँ 
वो तस्वीर तो 
अधूरी ही रहेगी ...
फीकी फीकी ...
उन रंगों के अभाव में 
जो सच में रहस्य के गर्त में समा गए हैं !

गुरुवार, 13 जून 2013

ताल्लुकातों से शादमानी है...







ताल्लुकातों से शादमानी है
बदनसीबी जो बदगुमानी है

कीमत काफिर की हमने जानी है 
उसूल उसका बेईमानी है

पैमांशिकन   इस ज़माने में
दस्तूर ऐ उम्मीद भी बेमानी है

फ़र्ज़ निभाए न आशनाई के
सो हकों पे भी पशेमानी है

वक्ते ऐ रुखसत किये वादे की
अब तो शिद्दत ही आजमानी है


शब्दार्थ 
शादमनी = खुशियाँ 
काफिर = ईश्वर के वर्चस्व को नकारने वाला 
पैमांशिकन = वादे से मुकरना 
आशनाई = प्रेम 

शुक्रवार, 24 मई 2013

मेरा वजूद दर्दे-ताब






न खार  न गुलाब 
मेरा वजूद दर्दे-ताब

फिर वही शामे मलाल
फिर खुली दिल की किताब

जो बढ़ने लगी तश्नगी
पाया लुत्फ ए चश्मे आब

चश्म ऐ पुरनम से देखो 
टपकने लगे रेज़ा ख्वाब 

जब की सुकूँ की तलाश 
दिया आईने ने जवाब

जो रूह मे बोये थे कभी    
सुखन मे ढूंढ़े वो ख्वाब 

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

यूं ही नहीं प्रेम शाश्वत है






तादात्मय सम्बन्ध 
जरुरी... 
दो पंखों के मध्य 
प्रेम की 
उड़ान के लिए !

और उतनी ही जरुरी 
स्वतंत्रता... 
गहरी जड़ों में 
बिना खोये 
अपनी  श्रद्धा और निष्ठा !
 
जैसे बूँद बूँद 
में है सक्षमता...
सागर  सृजन की 
और धरती में उपज की 

प्रेम में भी 
श्वास लेने की क्षमता 
ओसकण सी अनुभूति 
क्षण क्षण 
रखती है तरोताजा 

प्रेम में है प्रतिपल 
पुनरावृत्ति सी  
मरण 
और पुनर्जीवन की
  



तभी शायद प्रेम अजर है, अमर है 
यूं ही नहीं प्रेम शाश्वत है !





गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

सुनो !





सुनो !
अब तो बरसात भी नहीं रही ,
फिर ,
ये आँखों में सीला पन 
कैसे रह गया 


सुनो !
अब तो रात भी गुज़र गुई 
फिर,
ये आँखों में इंतज़ार 
कैसे रह गया


सुनो !
अब तो बहते बहते समंदर हो गए ,
फिर, 
लबों पर तिश्नगी 
कैसे रह गयी 


सुनो !
अब तो हर्फ़ भी ख़त्म हो चले 
फिर,
भी ये ख़त अधुरा 
कैसे रह गया 

...वन्दना...

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

कुछ बोल जुबाँ से निकले....







कुछ बोल जुबाँ से निकले  
कुछ निगाहे जुबाँ से पिघले...

रिश्ते नाते तमगे बन गए 
उम्मीदों के भी दम निकले 

इक तान सुन के मैं बह गई 
वो सुर में सुर मिला के बदले




मतलूब बदले तो बेशक बदले
बाखुदा तलब कभी न बदले

इब्तेदा में ही मर गए सब
इन्तेहा-ऐ-इश्क कौन बदले

जन्नत की तमन्ना में तिजारत
तमन्ना-ऐ-जन्नत में सजदे निकले

इबादत भी बुजदिलाना खिदमत
जहीनो ने भूखों के निवाले निगले



मतलूब = जिन्हें पाने ख़्वाहिश हो 
तिजारत = व्यापार 

शुक्रवार, 15 मार्च 2013

अहा !!! ज़िन्दगी...





मानो -
अवसाद में घुलती जाती ख़ुशी....
और पिघलती जाती जैसे मोमबत्ती ...
आहा !!! ....ज़िन्दगी !!!



हर हाल बस जलती घुलती जाती...
कभी थरथराती कभी भरभराती 
आहा !!! ...ज़िन्दगी !!!



ख्वाब और ख्वाहिशों के दरमियाँ
अधूरी मौत का जश्न मनाती 
आहा !!! ... ज़िन्दगी !!!



गर्जनाओं और वर्जनाओं में
विवश हो बधिर और मूक होती 
आहा !!! ... ज़िन्दगी !!!



समंदर के किनारे कुछ टूटते तारे 
और पानी में भीगे पंख फड़फडाती 
आहा !!! ... ज़िन्दगी !!!
...वन्दना ...

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

मृत्यु...एक भीषण यातना पूर्ण दुस्वप्न ही क्यूँ ?







मृत्यु...एक भीषण यातना पूर्ण दुस्वप्न ही क्यूँ ?



भारत में पुनर्जन्म की परिकल्पना के चलते निर्वाण जैसी अवधारणा मात्र दर्शन तक ही क्यूँ सीमित है ? शांति एवं गरिमा के साथ एक अनुकूल समय विशेष पर स्वेच्छिक मृत्यु का मूल अथवा विशेषाधिकार न होना कहीं दुर्भाग्यपूर्ण तो नहीं? मानवीय जीवन के संरक्षण के पीछे मूलभूत कारण क्या हैं?  

यदि भारतीय दर्शन को ध्यान में रखकर सोचा जाय तो यह कहीं से भी अनुचित नहीं प्रतीत होता क्योंकि गीता में जहां एक ओर यह कहा गया है की मृत्यु के लिए शोक व्यर्थ है क्योंकि दुबारा जन्म अवश्यम्भावी है वहीँ बौद्ध तथा जैन धर्म में यह स्पष्ट रूप से माना  जाता है की जीव अनेक बार जन्म लेता है जबतक वह निर्वाण / मोक्ष नहीं प्राप्त कर लेता या दूसरे शब्दों में जीवन मृत्यु के बंधन से मुक्त नहीं हो जाता । हालांकि निर्वाण शब्द बहुत विस्तृत है और जिस पर अनेक विचार प्रस्तुत किये जा सकते हैं , किन्तु यहाँ मुद्दा इच्छा मृत्यु है , जो कहीं न कहीं विसंगतियों से भरे जीवन जीने को विवश व्यक्ति का अधिकार होना चाहिए। 

यह भी एक तथ्य है की जीवन का आदि या अंत मानवीय बूते से बाहर का विषय है यह तो ईश्वराधीन क्रिया कलाप हैं , किन्तु कानूनन यदि इस तरह की व्यवस्था की जा सके तो इसमें क्या बुराई  हो सकती है   सिवाय इसके की इस अधिकार का दुरुपयोग होने की संभावनाएं बढ़ जायेंगी . 

आध्यात्मिक रूप से पूर्ण एवं सिद्ध मनुष्य/योगी  भी सांसारिक जीवन से 
विलग ही समय व्यतीत करते हैं और अक्सर अपनी देह का त्याग स्वेच्छा से कर सकते हैं  

मृत्यु को प्रतीक्षारत वो वृद्ध जिनकी आवश्यकता उनकी संतान तक को नहीं ,या वो मनुष्य जो किसी असाध्य बीमारी के कष्ट से पीड़ित हैं , जिनका भरण पोषण भी सहज नहीं अपितु कष्ट सहन करने के लिए विवश हैं क्या उन्हें इच्छा मृत्यु का विकल्प देने पर सुखद अनुभूति का अनुभव नहीं कराया जा सकता ?

कानूनी प्रकिया निसंदेह जटिल होगी अपितु होनी असम्भव सी ही है किन्तु क्या इस ओर विचार भी नहीं किया जा सकता ?

मानवीय अविश्वसनीयता और बौद्धिक जिज्ञासा कभी कभी ऐसे छोर पर ले जा कर छोड़ देती है जहां हम निरे अनुत्तरित रह जाते हैं। यह  संभवतः ऐसी ही समस्या है जिसे अक्सर छह कर नकार दिया जाता है।