गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

सुनो !





सुनो !
अब तो बरसात भी नहीं रही ,
फिर ,
ये आँखों में सीला पन 
कैसे रह गया 


सुनो !
अब तो रात भी गुज़र गुई 
फिर,
ये आँखों में इंतज़ार 
कैसे रह गया


सुनो !
अब तो बहते बहते समंदर हो गए ,
फिर, 
लबों पर तिश्नगी 
कैसे रह गयी 


सुनो !
अब तो हर्फ़ भी ख़त्म हो चले 
फिर,
भी ये ख़त अधुरा 
कैसे रह गया 

...वन्दना...