शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

माँ....


माँ....
मेरे उर में जागी है
इक व्यथा...
माँ, तुम जैसी
ही है मेरी
भी कथा......
माँ.....
तुमने सब दिया...
जन्म...
और सुख के सभी
आधार....
पर पुत्री को क्यूँ
न दिया सेवा
का अधिकार......
माँ.....
तुमने ही सिखाया प्रतिपल...
जल जल ...
दिव्य जीवन....
और उससे
साक्षात्कार....
माँ ......
तुम महा सिन्धु....
मैं तो मात्र एक
बिंदु....
पाया तुमसे ही आकार....
पंचतत्व आधार,
पर देह तो तुम्ही से
पायी माँ.....
समर्पित तुम्हे....
मेरे शब्दों की संवेदना.....
उऋण न हो सकेगी,
कभी....माँ....
तुम्हारी वन्दना.....

....वन्दना ....