शुक्रवार, 29 जून 2012



इबारत दर्द की लेकर इक आस सजाये हैं
चाहत के दरीचे मे पैबंद सजाये हैं

बस जर्फ के दम पे खामोश हूँ अब तक
अहबाब तो दास्तान ए महफिल सजाये हैं 

तस्कीन हो हासिल उस तन्हा दिल को यारब
चश्म ए नम छुपा कर ये लब मुस्कुराए हैं

बड़ी शिद्दत से रातो को जाग जाग कर
उस चाँद के पहलू मे सितारे सजाये हैं

...वन्दना...

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपके जज्बातों क़ी शिददत........
    दिल के दरीचे में बस गयी चाहत .......
    बेहतरीन ग़ज़ल वंदना !!!

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  2. bahut behtareen gazal ban padi hai....ek ek misra kabile tareef... chahat ke dareeche me...marhaba... kalam par allah miyan barkat nawajen..:)

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आपकी प्रतिक्रिया निश्चित रूप से प्रेरणा प्रसाद :)