गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

सुनो !





सुनो !
अब तो बरसात भी नहीं रही ,
फिर ,
ये आँखों में सीला पन 
कैसे रह गया 


सुनो !
अब तो रात भी गुज़र गुई 
फिर,
ये आँखों में इंतज़ार 
कैसे रह गया


सुनो !
अब तो बहते बहते समंदर हो गए ,
फिर, 
लबों पर तिश्नगी 
कैसे रह गयी 


सुनो !
अब तो हर्फ़ भी ख़त्म हो चले 
फिर,
भी ये ख़त अधुरा 
कैसे रह गया 

...वन्दना...

8 टिप्‍पणियां:

  1. dard bhare bheege bheege shabd...
    kya baat hey !

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  2. क्या बात है ... सुनो, सब कुछ कह दिया, फिर कुछ अधूरा रह गया ..

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  3. संवेदनशील और भावपूर्ण प्रस्तुति.

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  4. सुनो न ...सीलेपन के अवशेष में ही पूर्णता है ...ध्यान से देखो ..तृप्ति वही कहीं है ..वहीँ उसी अधूरेपन में .. मन तभी तो वही भागता है .....पूर्णता तो ... कुछ शेष ही नहीं रहने देती ...
    सुकोमल सी ..अपनी सी ..नम सी अभिव्यक्ति ...स्नेहाशीष वंदना

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  5. शब्द शब्द भावना लिए हुए ...बहुत खूब

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  6. आप सभी का हृदय से आभार !

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  7. प्रभावशाली कलम है आपकी ..
    बधाई !

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आपकी प्रतिक्रिया निश्चित रूप से प्रेरणा प्रसाद :)