बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

सांझ ढले.....








सांझ ढले जब पंछी चहके , दहका सूरज भी कुम्हलाया  
विस्मृति की खिड़की से गुपचुप ,यादों का बादल घिर आया 

पाषाण हृदय के कारा में , हो तृषित जरा जो मन घबराया 
मूक अभागी तृष्णा पथराई , रेतीला दरिया बह आया 

स्वप्न शेष पर निंदिया रूठी ,कोरों में खारा जल आया  
न चेहरा दिखता न हीं सपन , दरपन दरपन भी धुन्धलाया  

9 टिप्‍पणियां:

  1. mujhe jyada gyaan nhi h di par hindi ke itne kathin shabdo ko apne jitni khoobsurti se laybadhh kiya h maza aa gaya padh kar :)
    charan sparsh di !

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  2. bahut hi marmik chitran kiya hai shabdo ke anoothe taal mel ke saath vandana...

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  3. बहुत सुन्दर ... भावपूर्ण अभिव्यक्ति है ...

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  4. सायंकाल के बाद वियोगी मन का यथार्थ चित्रण, कलापक्ष और भावपक्ष दोनों दृष्टि से सुन्दर कविता।

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  5. कोमल और मन को छूती पंक्तियाँ !!

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  6. 'पाषाण ह्रदय के कारा में' में हृ के स्थान पर ह्र टंकित हुआ है इसलिए हृदय की कारा में हो जाए तो तो क्या पँक्ति त्रुटि रहित नहीं हो जाएगी?

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    1. प्रणाम ओम सर धन्यवाद आपका , आपके निर्देशानुसार टंकण दोष दूर हो पाया
      सादर !

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  7. हृदय के कारा है या की कारा है यह भी आप जरा देख ही लें।

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  8. शब्द भी पढ़ते पढ़ते धुंधलाने लगते हैं यूँ ही ऐसे ही
    असाधारण होने की कीमत रत्न बन कर चुकानी ……

    अभिव्यक्तियों के आकाश पर ऊँचे उठते जाओ
    बरसो जम कर भारहीन हो बह जाओ

    भिगो दिया तुमने कहूँ वंदना ?

    पाषाण ह्रदय की अटल गहराई
    बाहर निर्झर भीतर पथराई

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आपकी प्रतिक्रिया निश्चित रूप से प्रेरणा प्रसाद :)