"शब्द संवेदन" संवेदन शील मन से निकलने वाले शब्द जो स्वरुप ले लेते हैं कविता का, ग़ज़ल का,नज़्म का... लेखनी के सहारे,अभिव्यक्ति का आधार हमारे शब्द संवेदन इंसानी जीवन की अहम् जरूरत हैं. और अभिव्यक्ति वाकई जीवन को हल्का,सहज और सरल बना देती है.बेशक महज़ आत्मसंतुष्टि के लिए नहीं बल्कि जिंदगी के अनुभव भी ,चाहे खट्टे हो या फिर मीठे,संवेदनाओं को शब्दों में पिरोने और अभिव्यक्त करने के साथ ही हमारे सोच विचारों के झंझावातों में फंसे दिल और दिमाग को शांत कर देते हैं. "शब्द संवेदन" पर आप सभी का स्वागत है.
बुधवार, 25 जुलाई 2012
सोमवार, 16 जुलाई 2012
एक भरोसा है ; तो बद गुमानी भी
इस दुनिया के बहुत से
दिल, टूटते - बिखरते - चूर चूर देखकर...
न जाने क्यूँ सच लगता है-
कि, दोस्ती प्यार और रिश्ते
सिर्फ टूटकर ही ख़त्म होते हैं
दोस्ती भी जरूरत के आधार पर...
प्यार दुनिया की सहमती के
और..
और रिश्ते...?
खुदगर्जी और धोखों का
एक अच्छा सा नाम ही मात्र ...
दोस्ती प्यार और रिश्ते-
सिर्फ टूटकर ही ख़त्म नहीं होते
कभी - कभी
यूँ ही हौले से....
अपने आप - दिलों में ही ख़त्म हो जाते हैं ,
अब डर टूटने से नहीं लगता
खुद ही ख़त्म होने से लगता है
टूटने और तोड़ने के बाद भी
ह्रदय में स्पंदन सा बाकी सा बचा रह जाता है
एक पीड़ा ह्रदय में बस जाती है
एक स्मृति ह्रदय पर छाई रहती है...
पर...
पर यूँ ही ..हौले से अपने आप ही
दिलों में ख़त्म हो जाने के बाद
शेष तो कुछ बचता ही नहीं -
मात्र स्पंदन भी नहीं
तनिक क्षोभ भी नहीं.
...वन्दना...
इस दुनिया के बहुत से
दिल, टूटते - बिखरते - चूर चूर देखकर...
न जाने क्यूँ सच लगता है-
कि, दोस्ती प्यार और रिश्ते
सिर्फ टूटकर ही ख़त्म होते हैं
दोस्ती भी जरूरत के आधार पर...
प्यार दुनिया की सहमती के
और..
और रिश्ते...?
खुदगर्जी और धोखों का
एक अच्छा सा नाम ही मात्र ...
दोस्ती प्यार और रिश्ते-
सिर्फ टूटकर ही ख़त्म नहीं होते
कभी - कभी
यूँ ही हौले से....
अपने आप - दिलों में ही ख़त्म हो जाते हैं ,
अब डर टूटने से नहीं लगता
खुद ही ख़त्म होने से लगता है
टूटने और तोड़ने के बाद भी
ह्रदय में स्पंदन सा बाकी सा बचा रह जाता है
एक पीड़ा ह्रदय में बस जाती है
एक स्मृति ह्रदय पर छाई रहती है...
पर...
पर यूँ ही ..हौले से अपने आप ही
दिलों में ख़त्म हो जाने के बाद
शेष तो कुछ बचता ही नहीं -
मात्र स्पंदन भी नहीं
तनिक क्षोभ भी नहीं.
...वन्दना...
गुरुवार, 26 अप्रैल 2012
जो सम्बन्ध है,
वही तो पापों का अनुबंध है...
हमारा अंतर कहीं न कहीं /
कभी न कभी
पुण्य प्राप्ति चाहता है
तभी तो वह कभी किसी
'पत्थर' को पूज लेने में भी
नहीं हिचकिचाता है ;
हम कितनी जटिलता
से जकड़े हैं , इन
सही और गलत शब्दों के बीच में...
चुन चुन कर प्रेम चुनते हैं..
सावधानी पूर्वक निर्णय करते हैं
और...
अक्सर ही सीधी , सरल राह चुनते हैं
चलने के लिए , कि
मंजिल तक पहुँच जाएँ
पर हो सकता है,
इससे भी ज्यादा ...
और भी ज्यादा
हम उसी 'मध्य' में
फंसते जाते हैं
क्योंकि ,
बहुत कुछ करने की इच्छाएं दबाकर
अग्नि से खेलते हैं...
....वन्दना...
निसंदेह , सब कुछ
व्यर्थ है -
निस्सार है
इंसान - कितनी मेहनत करता है
'कुछ ' पाने के लिए
परन्तु इस धरती पर
आखिर उसे क्या मिलता है ?
बहुत कुछ पाकर भी ,
मात्र संतोष भी नहीं मिल पाता
चाहा,अनचाहा
सब होने के बावजूद
कमी 'कुछ' की रह ही जाती है
और यूँ ही...
एक पीढ़ी गुजरती है
दूसरी आ जाती है
पर ये धरती
सदा ऐसे ही रहती है
वक्त ऐसे ही चलता रहता है
इस पर बसने वाले
और जीने वाले
इंसान का / उसकी उदासी का
उस पर फरक नही पड़ता
वो थी ,
और शायद
चिरकालीन है .
सूरज अपनी निश्चित जगह से
उगता है
और सुनिश्चित जगह जाकर
छिप जाता है ,
सभी नदियाँ ...
सागर में मिलती हैं,पर
सागर कभी भरता नहीं
फिर भी नदियाँ...
अपने उद्-गम स्थल से
बहती रहती हैं ,रूकती नहीं ...
कहीं भी पडाव नहीं...
इंसान भी जन्म लेता है
और मर जाता है
सच, सब बातें थकाने वाली हैं
आँखें देखकर भी तृप्त नहीं होती
कान...सुन कर भी संतुष्ट नहीं होते,
मनुष्य...
इनका वर्णन भी नही कर सकता...
जो हो चुका है घटित
वही पुनः होगा
और होता रहेगा...
सूरज ,नदियाँ,इंसान...
सब अवश- विवश
इस धरती पर,
आसमां के नीचे
कुछ भी नया नहीं है
कुछ भी ऐसा नहीं है
जिसे देख कर कोई कहे...
'देखो वह बात नयी है'
नहीं!!!
सब हो चुका है
अतीत में सब सुरक्षित है
और उसकी स्मृति
वर्तमान में भी शेष नहीं रह पाती
और ना हमारे पश्चात
आने वालों को याद रहेगा
उनका अतीत ...
इसलिए ..
सब व्यर्थ है..
सब निस्सार है...
इस पृथ्वी पर...
....वन्दना...
शनिवार, 21 अप्रैल 2012
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