बुधवार, 25 जुलाई 2012

 
जीवन 'हास' - 'परिहास' नहीं है

'माया' में 'भ्रमित ज्ञान' का भास नहीं है.


हो सहज , सरल और सुन्दर जीवन

'मानव' को इसका अभ्यास नहीं है


'खेल'- 'विधि' और 'विधाता' रचित

यहाँ कौन 'काल' का 'दास' नहीं है????

...वन्दना....

सोमवार, 16 जुलाई 2012



एक भरोसा है ; तो बद गुमानी भी
इस दुनिया के बहुत से
दिल, टूटते - बिखरते - चूर चूर देखकर...
न जाने क्यूँ सच लगता है-
कि, दोस्ती प्यार और रिश्ते
सिर्फ टूटकर ही ख़त्म होते हैं
दोस्ती भी जरूरत के आधार पर...
प्यार दुनिया की सहमती के
और..
और रिश्ते...?
खुदगर्जी और धोखों का
एक अच्छा सा नाम ही मात्र ...

दोस्ती प्यार और रिश्ते-
सिर्फ टूटकर ही ख़त्म नहीं होते
कभी - कभी 
यूँ ही हौले से....
अपने आप - दिलों में ही ख़त्म हो जाते हैं ,
अब डर टूटने से नहीं लगता
खुद ही ख़त्म होने से लगता है
टूटने और तोड़ने के बाद भी
ह्रदय में स्पंदन सा बाकी सा बचा रह जाता है
एक पीड़ा ह्रदय में बस जाती है
एक स्मृति ह्रदय पर छाई रहती है...
पर...
पर यूँ ही ..हौले से अपने आप ही
दिलों में ख़त्म हो जाने के बाद
शेष तो कुछ बचता ही नहीं -
मात्र स्पंदन भी नहीं
तनिक क्षोभ भी नहीं.

...वन्दना...

शुक्रवार, 29 जून 2012



इबारत दर्द की लेकर इक आस सजाये हैं
चाहत के दरीचे मे पैबंद सजाये हैं

बस जर्फ के दम पे खामोश हूँ अब तक
अहबाब तो दास्तान ए महफिल सजाये हैं 

तस्कीन हो हासिल उस तन्हा दिल को यारब
चश्म ए नम छुपा कर ये लब मुस्कुराए हैं

बड़ी शिद्दत से रातो को जाग जाग कर
उस चाँद के पहलू मे सितारे सजाये हैं

...वन्दना...

बुधवार, 6 जून 2012

तिश्नगी से जो इज्तिराब है,
जायका.ऐ.अश्क लाजवाब है!!!


इक यादे अय्यामे गुजिश्ता के मतलूब,
कमबख्त तलब से तबाह जोशे ख्वाब है...
.....वन्दना.....

शनिवार, 26 मई 2012



दंड दिधि का विधान
कभी मर्यादा महान
कभी कर्म ही प्राण
सहन शक्ति प्रमाण
आत्म व्यथा पुनर्निर्माण
संस्कार आहूत  आह्वान 
निज तन मन धन बलिदान
संस्कारों का सत्  प्रधान
....वन्दना ...

शुक्रवार, 18 मई 2012




 
 
 
तेरे ख़ुलूस में जियूं और मर जाऊं
हर हाल बहरहाल तुझे ही पाऊं

विसाले ख्वाब की जुस्तजू में
हर शब् ही आँखों के ग़म उठाऊँ

कभी यूं भी हो के खयाले आज़ादी...
कैद-ऐ-हयात से मिलेगी भूल जाऊं..
...वन्दना....

मंगलवार, 1 मई 2012




क्षण-क्षण...
हंस -हंस...
तिल -तिल...
जल कर...
जीवन वैभव.....ज्वाला...

...वन्दना...

गुरुवार, 26 अप्रैल 2012



इच्छाओं और अग्नि के मध्य 
जो सम्बन्ध है,
वही तो पापों का अनुबंध है...
हमारा अंतर कहीं न कहीं /
कभी न कभी
पुण्य प्राप्ति चाहता है 
तभी तो वह कभी किसी 
'पत्थर' को पूज लेने में भी 
नहीं हिचकिचाता है ;
हम कितनी जटिलता 
से जकड़े हैं , इन 
सही और गलत शब्दों के बीच में...
चुन चुन कर प्रेम चुनते हैं..
सावधानी पूर्वक निर्णय करते हैं 
और...
अक्सर ही सीधी , सरल राह चुनते हैं 
चलने के लिए , कि 
मंजिल तक पहुँच जाएँ 
पर हो सकता है,
इससे भी ज्यादा ...
और भी ज्यादा 
हम उसी 'मध्य' में 
फंसते जाते हैं
क्योंकि ,
बहुत कुछ करने की इच्छाएं दबाकर 
अग्नि से खेलते हैं...

....वन्दना...





इस पृथ्वी पर 
निसंदेह , सब कुछ 
व्यर्थ है  -
निस्सार है
इंसान - कितनी मेहनत करता है
'कुछ ' पाने के लिए 
परन्तु इस धरती पर 
आखिर उसे क्या मिलता है ?
बहुत कुछ पाकर भी ,
मात्र संतोष भी नहीं मिल पाता
चाहा,अनचाहा 
सब होने के बावजूद 
कमी 'कुछ' की रह ही जाती  है 
और यूँ ही...
एक पीढ़ी गुजरती है 
दूसरी आ जाती  है 

पर  ये धरती 
सदा ऐसे ही रहती है 
वक्त ऐसे ही चलता रहता है 
इस पर बसने वाले 
और जीने वाले 
इंसान का / उसकी उदासी का 
उस पर फरक नही पड़ता
वो थी ,
और शायद 
चिरकालीन है .

सूरज अपनी  निश्चित जगह से
उगता है 
और सुनिश्चित जगह जाकर 
छिप जाता है ,
सभी नदियाँ ...
सागर में मिलती हैं,पर
सागर कभी भरता नहीं 
फिर भी नदियाँ...
अपने उद्-गम  स्थल से 
बहती रहती हैं ,रूकती नहीं ...
कहीं भी पडाव नहीं...

इंसान भी जन्म लेता है
और मर जाता है
सच, सब बातें थकाने वाली हैं 

आँखें देखकर भी तृप्त नहीं होती 
कान...सुन कर भी संतुष्ट नहीं होते,
मनुष्य...
 इनका वर्णन भी नही कर सकता...
जो हो चुका है घटित 
वही  पुनः होगा 
और होता रहेगा...

सूरज ,नदियाँ,इंसान...
सब अवश- विवश 
इस धरती पर,
आसमां के नीचे 
कुछ भी नया नहीं है 
कुछ भी ऐसा नहीं है 
जिसे देख कर कोई कहे...
'देखो वह बात नयी है'
नहीं!!!
सब हो चुका है
अतीत  में सब सुरक्षित है 
और उसकी स्मृति 
वर्तमान में भी शेष नहीं रह पाती 
और ना हमारे पश्चात 
आने वालों को याद रहेगा 
उनका अतीत ...
इसलिए ..
सब व्यर्थ है..
सब निस्सार है...
इस पृथ्वी पर...

....वन्दना...

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

इश्क



ग़ुलामी इश्क में मन्नत....
तबाही इश्क में जन्नत..
खुदी का दम भरना..
मुहब्बत में न करना...
...वन्दना..